Ghazals Of Ghalib

The Almighty Of Rekhta

Mirza Asadullah Khan (Ghalib)-27-12-1797(Agra) To 15-02-1869 (Delhi)

 

Famous Couplets Page no.26

 

 

 

 

251.

पम्बा-दर-गोश है हर शख्श यहां कौन सुनेगा ,
मैं सुनाता हूँ मगर किस्सा-ए-जां कौन सुनेगा। (अख्तर)

 

252.
उम्र भर का तूने पैमान-ए-वफ़ा बांधा तो क्या ,
उम्र को भी तो नहीं है पाएदारी हाय हाय। (ग़ालिब)

 

253.
मैं तो जब जानूं की भर दे सागर-ए-हर खास-ओ-आम ,
यूँ तो जो भी आया पीर-ए-मूगाँ बनता गया। (मज़रूह)

 

254.
अमल के वास्ते लाज़िम है पुख्ताकारी-ए-हिम्मत ,
की अक्सर हलके रंगों से बिगड़ जाती है तस्वीरें। (सोज़)

 

255.
तुझे ऐ ज़िंदगी आइना बन कर हमने देखा है ,
संवर जाने पे भी गेसू तेरे पेचीदा रहते हैं। (फारुकी)

 

256.
वो पूछते हैं तूने तो पैकान नहीं देखा।
गर ज़ख्म न कह दे तो कहूँ, हाँ नहीं देखा। (जायसी)

 

257.
ज़िंदगी है फ़क़ीर की झोली ,
दर्द की भीख डालते जाओ। (ज़फर)

 

258.
क़र्ज़ की पीते थे मयलेकिन समझते थे कि हाँ ,
रंग लाएगी हमारी फ़ाक़ामस्ती एक दिन (ग़ालिब)

 

259.
तंग इतना दमन-ए-फिक्र-ओ-अमल होता गया ,
ज़िंदगी भर आजकल ही आजकल होता गया। (जिगर)

 

260.
"सीमाब" नाला करके पशेमानियाँ फ़ुज़ूल ,
वो काम क्यों किया जो उन्हें नागवार था। (सीमाब)

 

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