Ghazals Of Ghalib

The Almighty Of Rekhta

Mirza Asadullah Khan (Ghalib)-27-12-1797(Agra) To 15-02-1869 (Delhi)

Famous Couplets Page no.27

 

 

 

 


261.
अल्लाह अगर तौफीक़ न दे इंसान के बस का काम नहीं ,
फैज़ान-ऐ-मोहब्बत आम सही इरफ़ान-ऐ-मोहब्बत आम नहीं। (जिगर)

 

262.
तेरा ख्याल, तेरी याद, तेरी धुन, ऐ दोस्त ,
मुझे ये होश कहाँ है कि बंदगी क्या है। (नूर)

 

263.
बिछड़ कर क़ाफ़िले से बदहवास इतना हुआ हूँ मैं ,
कि हर आवाज़ अब बांगेदरा मालूम होती है। (अर्श)

 

264.
बिना है एक ही दोनों की, काबा हो कि बुतख़ाना,
उठा कर ख़िश्त-ऐ-ख़ुम हमने, वहां रख दी, यहां रख दी। (रियाज़)

 

265.
उमीद-ओ-बीम का आलम तो देखो ,
लरज़ता है दिया, बुझता नहीं है। (सानी)

 

266.
इंसां के बुग्ज़-ओ-जहल से दुनिया तबाह है ,
तूफाँ उठ रहा है, ये मुश्त-ए-गुबार क्या। (चकबिस्त)

 

267.
क्यों मेरी बूद-ओ-बाश की पुर्सिश है हर घड़ी,
तुम तो कहो कि रहते हो दो दो पहर कहाँ। (मीर)

 

268.
तेरी याद बेइख्तियार आ रही है,
तमन्ना की फ़स्ल-ए-बहार आ रही है। (मोहानी)

 

269.
बहार-ए-बोस्तां की हस्ती-ए-रंगी बस इतनी है,
कोई इक गीत गा ले फूल पर, और हम फुगाँ कर ले। (सीमाब)

 

270.
हम जो पहुंचे तो रहगुज़र ही न थी ,
तुम जो आये तो मंजिलें लाये। (ज़ेहरा)

 

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