Ghazals Of Ghalib

The Almighty Of Rekhta

Mirza Asadullah Khan (Ghalib)-27-12-1797(Agra) To 15-02-1869 (Delhi)

Famous Couplets Page no.25

 





241.
चिराग-ए-महफ़िल-ए-दौरां न सर्द  हो जाये ,
तेरी निगाहों में अक्स-ए-मलाल आता ह।  (रंजन)

242.
नईम, क्या है अंधेर तेरी बख्शीश का ,
जो ज़ुल्मतों से घिरी है वो आगही दी है। (मुनव्वर)

243.
बख्शा था हक़ ने मुझको मुहब्बत भरा दिल ,
नाआशना भी मेरे लिए आशना रहा। (हाफिज)

244.
अदा से झुक के मिलते हो , निगाह से क़त्ल करते हो ,
सितम इज़ाद हो , नावक लगाते हो कमां होकर। (रंजन)

245.
न मुड़ कर के बेदर्द क़ातिल ने देखा ,
तड़पते रहे नीमजां कैसे कैसे। (आतिश )

246.
अब तो सब मिट भी गए तेरी यादों के नुकूश ,
फिर मेरे हाथ में उभरी नै रेखा कैसे। (जावेद)

247.
ये दमकते हुए ज़र्रात पता देते हैं ,
इस तरफ से वो कभी नूरफ़िशां गुज़रे हैं। (मंशा)

248.
नेक दिल , नेक नफ़स , नेक मराम और भी हैं ,
इश्क़ के बन्दे , मुहब्बत के ग़ुलाम और भी हैं। (कुरेसी)

249.
नैज़े पे रखके और मेरा सर बुलंद कर ,
दुनिया को एक चिराग तो जलता दिखाई दे। (ज़फर)

250
ईद है और साक़ी-ए-नौख़ेज़ मैखाने में है ,
आज पीने का मज़ा पी कर बहक जाने में है। (शिकोह)

 

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