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Ghazals Of Ghalib

The Almighty Of Rekhta

Mirza Asadullah Khan (Ghalib)-27-12-1797(Agra) To 15-02-1869 (Delhi)

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Famous Couplets-17




(161)
सीग़ा-ए-राज़ में रख्खा था मशीयत ने जिन्हें,
वो हक़ाइक़ हो गए मेरी ग़ज़ल में बे नक़ाब !(फ़िराक़)

(162)
निकले है उसकी जुल्फ-ए-पुरखं से,
सुम्बुल-ए-ताबदार का आलम !(मुसहफ़ी)

(163)
सू-ए-मैकदा न जाते तो कुछ और बात होती,
वो निगाह से पिलाते तो कुछ और बात होती!(आग़ा)

(164)
पियूँगा आज साक़ी सेर होकर,
मयस्सर फिर शराब आये न आये !(दाग़)

(165)
ताकि तुझ पर खुले एजाज़-ए-हवा-ए-सैक़ल,
देख बरसात में सब्ज़ आईने का हो जाना !(ग़ालिब)

(166)
हम खुद ही थे सोखता मुक़द्दर,
हाँ,आप सितारागर ही ठहरे !(शाकिर)

(167)
कुछ और महकते हम,कुछ और बहकते हम.
उन मदभरी आँखों की सौगात तो कुछ होती!(क़ासमी)

(168)
आ ही जाता है ज़माने में इक ऐसा हंगाम,
मौज-ए-तूफ़ां भी तड़पती है किनारे के लिए !(निगाह)

(169)
नवाज़िश-हा-ए-बेजा देखता हूँ,
शिकायत-हा-ए-रंगी का गिला क्या !(ग़ालिब)

(170)
ऐ 'हयात-ए-वारसी' सब को है इसका ऐतिराफ़,
सारी दुनिया में मिसाली हिन्द की जम्हूरियत !(हयात)

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